Do Sir Vala Bharund भाग 1
Do Sir Vala Bharund-बहुत समय पहले की बात है, एक विशाल और घने जंगल के किनारे, भारुंड नामक एक विचित्र पक्षी रहता था। इस पक्षी की सबसे अनोखी बात यह थी कि उसके दो सिर थे, लेकिन शरीर एक। हालांकि शरीर एक होने के कारण दोनों सिरों को समान भोजन और पानी मिलता था, उनके विचार और दृष्टिकोण पूरी तरह से अलग थे। हर समय वे एक-दूसरे से उलझे रहते, और किसी भी सामान्य बात पर उनकी सहमति होना लगभग असंभव था। इन दोनों सिरों के बीच हर समय कोई न कोई बहस होती रहती थी।
भारुंड के दोनों सिरों में से एक सिर हमेशा चतुर और अपने हितों के बारे में सोचने वाला था। उसे केवल अपनी इच्छाओं की परवाह थी। वह दूसरे सिर की बातों को नजरअंदाज कर अपनी मनमानी करता था। दूसरा सिर शांत और समझदार था, उसे एहसास था कि वे दोनों एक ही शरीर के हिस्सेदार हैं, इसलिए एक की हरकतों का असर दोनों पर पड़ना तय था। फिर भी, पहले सिर के हठ और स्वार्थ ने उनके बीच लगातार झगड़े की दीवार खड़ी कर दी थी।
एक दिन, भारुंड भोजन की तलाश में उड़ान भरता है। जंगल के बीच उड़ते-उड़ते पहले सिर की नज़र एक चमकते हुए मीठे फल पर पड़ती है। यह फल बहुत ही सुगंधित और सुंदर था, जिससे उसका मन ललचा उठा। पहले सिर ने तुरंत उस फल पर झपट्टा मारा और उसे अपनी चोंच में जकड़ लिया। उसकी आंखों में चमक थी, क्योंकि वह जानता था कि यह फल बहुत स्वादिष्ट होगा। वह खुशी-खुशी फल का आनंद लेने के लिए तैयार था।
लेकिन तभी दूसरा सिर बोल पड़ा, “इस फल को हमें साथ मिलकर खाना चाहिए। हम दोनों एक ही शरीर का हिस्सा हैं, इसलिए हमें इसे बाँटना चाहिए।”
पहले सिर ने उसकी बात को अनसुना करते हुए कहा, “मैंने इस फल को ढूंढा है, और मैं ही इसे खाऊंगा। तुमने इसे ढूंढने में कोई मदद नहीं की, इसलिए तुम इसे खाने के हकदार नहीं हो।”
“दूसरा सिर तुरंत बोला, ‘हम दोनों एक ही शरीर का हिस्सा हैं। जो भी तुम खाओगे, उसका असर हम दोनों पर पड़ेगा। हमें इसे साथ मिलकर खाना चाहिए।
पहला सिर चिढ़ते हुए बोला, “तुम हमेशा अपनी समझदारी दिखाने की कोशिश करते हो, लेकिन इस बार मैं तुम्हारी बात नहीं मानूंगा। यह फल मैं अकेले खाऊंगा, और तुम्हें इसमें कोई हिस्सा नहीं मिलेगा।”
पहले सिर की इस हठधर्मी और स्वार्थी हरकत ने दोनों के बीच तनाव को और बढ़ा दिया। दूसरा सिर दुख और निराशा से भर गया, मगर वह असहाय था। पहले सिर ने पूरे फल को अकेले ही चबा लिया और उसका आनंद लिया, जबकि दूसरा सिर केवल असहाय होकर देखता रहा।

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यह घटना एक छोटी सी बात लग सकती थी, लेकिन इसके बाद दोनों सिरों के बीच के मतभेद और भी गहरे हो गए। दोनों सिरों की सोच में दूरी इतनी बढ़ गई कि अब वे हर छोटी-बड़ी बात पर बहस करने लगे। पहले सिर ने यह मान लिया था कि उसे हर चीज़ का अधिकार है, क्योंकि वह हमेशा पहले काम करता है, जबकि दूसरा सिर यह सोचने लगा कि उसे हमेशा नज़रअंदाज किया जा रहा है।
इस बात से परेशान होकर दूसरा सिर मन ही मन कुछ बड़ा सोचने लगा। उसे इस बात का एहसास था कि अगर वह इसी तरह पहले सिर की मनमानी सहन करता रहा, तो उसके अस्तित्व का कोई मतलब नहीं रह जाएगा। वह भी इस शरीर का हिस्सा था और उसका भी बराबर का हक था। इसी सोच में डूबे हुए एक दिन दूसरा सिर एक खतरनाक निर्णय लेने की ओर बढ़ने लगा।
उसने सोचा, “पहला सिर हमेशा अपने बारे में सोचता है। उसे लगता है कि सिर्फ वही सबकुछ कर सकता है, लेकिन मैं उसे दिखा दूँगा कि मेरे बिना उसका कोई अस्तित्व नहीं है। अगर मैं इस शरीर को नुकसान पहुँचाता हूँ, तो उसे भी इसका खामियाजा भुगतना पड़ेगा।”
कुछ समय बाद, एक दिन भारुंड उड़ते हुए जंगल के बीच एक पेड़ के पास पहुँचा। उस पेड़ पर एक जहरीला फल लटका हुआ था। फल की चमक ने दूसरे सिर का ध्यान खींचा। पहले सिर को इस फल से कोई मतलब नहीं था, क्योंकि वह पहले ही अपनी इच्छा पूरी कर चुका था और उसे अब किसी और चीज़ की लालसा नहीं थी। लेकिन दूसरे सिर ने जानबूझकर इस विषैले फल को खाने का निर्णय लिया।
दूसरा सिर, जो अब तक समझदार और शांत दिखाई देता था, अपनी नाराजगी में यह सोचने लगा कि अगर पहले सिर उसे अपना अधिकार नहीं देने के लिए इतना स्वार्थी हो सकता है, तो वह भी अपनी नाराजगी दिखा सकता है। वह यह भूल गया था कि उनके पास एक ही शरीर था, और अगर वह शरीर को नुकसान पहुँचाएगा, तो उसका असर दोनों पर पड़ेगा।
दूसरे सिर ने उस जहरीले फल को चबाने का फैसला कर लिया। वह फल को अपनी चोंच में ले आया और धीरे-धीरे उसे खाने लगा। पहले सिर ने जब यह देखा तो वह चौंक उठा और जोर से चिल्लाया, “तुम क्या कर रहे हो? यह फल जहरीला है! अगर तुम इसे खाओगे, तो हम दोनों मर जाएंगे।”
दूसरा सिर हंसते हुए बोला, “तुम्हें अब मेरी तकलीफ समझ में आई? तुम हमेशा मेरे साथ ऐसा ही व्यवहार करते हो, जैसे मैं इस शरीर का हिस्सा नहीं हूँ। लेकिन अब देखो, अगर मैं मरूंगा, तो तुम भी मरोगे। हमें एक-दूसरे का साथ देना चाहिए था, लेकिन तुमने हमेशा मुझे नीचा दिखाया। अब भुगतो इसका परिणाम।”
दूसरे सिर की इस हरकत से पहले सिर को गहरी समझ का एहसास हुआ। वह समझ गया कि उनके बीच आपसी तालमेल और सहयोग की कितनी जरूरत थी। अगर वे एक-दूसरे के साथ मिलकर काम नहीं करेंगे, तो दोनों का जीवन खतरे में पड़ जाएगा। इस तरह के मतभेद केवल उनके विनाश की ओर ही ले जाएंगे।
पहला सिर डर और पछतावे से भर गया। उसने विनती करते हुए कहा, “मैं माफी चाहता हूँ। मैं स्वार्थी था और मैंने तुम्हारे साथ अन्याय किया। लेकिन यह जहरीला फल मत खाओ, वरना हम दोनों का जीवन समाप्त हो जाएगा। हमें मिलकर इस शरीर को स्वस्थ और सुरक्षित रखना चाहिए।”
दूसरे सिर ने थोड़ी देर के लिए सोचा। उसने पहले सिर की आंखों में पछतावे और डर को देखा। उसे समझ में आया कि उनका झगड़ा उन्हें विनाश की ओर ले जा रहा था। उसने जहरीले फल को छोड़ दिया और दोनों सिर एक समझौते पर पहुँचे कि आगे से वे मिल-जुलकर काम करेंगे और अपने मतभेदों को सुलझाने का प्रयास करेंगे।
कहानी का अगले भाग में विकास
हालाँकि, इस घटना के बाद दोनों सिरों के बीच थोड़ी शांति जरूर आई, लेकिन यह देखना बाकी है कि क्या वे अपनी स्वाभाविक प्रवृत्तियों पर काबू पा सकेंगे। क्या पहले सिर का स्वार्थी स्वभाव और दूसरे सिर की नाराजगी भविष्य में फिर से उभरेंगी? क्या वे एक-दूसरे के साथ मिलकर जीना सीख पाएंगे, या फिर इस दो सिरों की लड़ाई में कोई बड़ा परिणाम निकलेगा?
कहानी यहीं समाप्त नहीं होती, बल्कि यह उनके बीच के रिश्ते और समझ के विकसित होने की दिशा में बढ़ती है। आने वाले समय में भारुंड और उसके दो सिरों के बीच क्या होगा, यह जानने के लिए हमें इस कहानी के अगले भाग की प्रतीक्षा करनी होगी। (Do Sir Vala Bharund)
Do Sir Vala Bharundभाग 2
कई दिनों तक भारुंड के दोनों सिरों के बीच समझदारी और शांति बनी रही। पहले सिर ने अपने स्वार्थी व्यवहार के लिए माफी माँगी थी और दूसरे सिर ने भी उसे माफ कर दिया था। दोनों सिरों ने यह निर्णय लिया था कि अब से वे मिलकर काम करेंगे और भोजन या किसी भी निर्णय में एक-दूसरे का सम्मान करेंगे। इस नए समझौते से वे कुछ समय तक संतुलन बनाए रखने में सफल रहे।
लेकिन यह शांति स्थायी नहीं थी। पुराने द्वेष और ईर्ष्या की भावनाएँ एक बार फिर उभरने लगीं। दूसरे सिर को यह याद आने लगा कि पहले सिर ने कितनी बार उसके अधिकारों का हनन किया था। उसे यह भी लगने लगा कि अगर वह अब फिर से कमजोर दिखेगा, तो पहले सिर फिर से अपनी पुरानी आदतों पर लौट आएगा। इन विचारों से ग्रसित होकर दूसरा सिर एक बार फिर क्रोध और द्वेष में डूबने लगा।
एक दिन, जब भारुंड फिर से भोजन की तलाश में निकला, दूसरा सिर अचानक एक बड़े पेड़ पर एक फल को चमकते हुए देखता है। यह फल आकार में बहुत बड़ा और दिखने में बेहद आकर्षक था, लेकिन इसकी चमक में कुछ अजीब सा था। दूसरे सिर की आँखों में लालच और क्रोध की चमक थी। उसे यह मौका अच्छा लगा कि वह पहले सिर से बदला ले सके और उसे नीचा दिखा सके।
पहले सिर ने भी उस फल को देखा और तुरंत उसे पहचान लिया। यह वही जहरीला फल था जिसे कुछ दिन पहले दूसरा सिर खाने का प्रयास कर रहा था। पहले सिर ने तत्काल चेतावनी दी, “यह फल बेहद जहरीला है। इसे खाने से हम दोनों की मौत हो सकती है। कृपया इसे मत खाओ।”
लेकिन दूसरे सिर ने उसकी बातों को अनसुना करते हुए हँसते हुए कहा, “तुम्हें लगता है कि तुम मुझे रोक सकते हो? तुम हमेशा अपने फायदे के बारे में सोचते हो, अब मुझे भी अपना अधिकार मिलना चाहिए। मैं यह फल खाकर दिखाऊँगा कि मुझे कोई फर्क नहीं पड़ता।”
पहले सिर ने दु:खी होकर विनती की, “हमारे जीवन का सवाल है। हम दोनों एक ही शरीर में रहते हैं, और अगर तुम इसे खाओगे तो हम दोनों मर जाएँगे। द्वेष में आकर ऐसा कुछ मत करो।” (Do Sir Vala Bharund)
लेकिन दूसरा सिर पहले सिर की चेतावनियों को नज़रअंदाज करते हुए अपने गुस्से में फल को चबाने लगा। उसे इस बात का अहंकार था कि वह पहले सिर को नीचा दिखाकर विजयी होगा।

जैसे ही दूसरे सिर ने वह जहरीला फल खाया, उसका स्वाद पहले मीठा लगा, लेकिन कुछ ही क्षणों में उसके गले और पेट में एक जलन सी महसूस होने लगी। उसके चेहरे पर एक अजीब दर्द दिखाई देने लगा। जहर धीरे-धीरे उसके शरीर में फैलने लगा। (Do Sir Vala Bharund)
पहले सिर ने यह देखा और उसका दिल जोर-जोर से धड़कने लगा। उसने दुख और गुस्से के मिले-जुले भावों से कहा, “मैंने तुम्हें पहले ही चेताया था, लेकिन तुमने मेरी बात नहीं मानी। अब इस जहर का असर हम दोनों पर होगा। तुम अपने द्वेष में अंधे हो गए, और अब हमारी मौत निश्चित है।”
दूसरा सिर, जो अब तक खुद को जीतता हुआ महसूस कर रहा था, धीरे-धीरे कमजोरी और दर्द से भरने लगा। उसके अंदर की जलन और पीड़ा इतनी बढ़ गई कि उसकी आँखों के सामने अंधेरा छा गया। दोनों सिर अब एक-दूसरे से कुछ कहने की हालत में नहीं थे। जहर तेजी से पूरे शरीर में फैल गया, और भारुंड का शरीर धीरे-धीरे अपना संतुलन खोने लगा।
कुछ ही क्षणों में दोनों सिरों के साथ-साथ भारुंड का पूरा शरीर धीमा होने लगा। उसका शरीर बेकार हो गया था, और उसके पंख लड़खड़ाने लगे। जो पक्षी कभी आसमान में स्वतंत्रता से उड़ान भरता था, अब वह जमीन पर गिरने वाला था। जहर ने दोनों सिरों के शरीर को पूरी तरह से कमजोर कर दिया था। भारुंड का शरीर जमीन पर गिर पड़ा और उसकी आखिरी सांसें भी थम गईं।
दोनों सिरों ने अंत में यह महसूस किया कि उनके आपसी द्वेष और फूट के कारण उनके जीवन का अंत हो गया। अगर उन्होंने मिलकर काम किया होता और एक-दूसरे की बातों को समझा होता, तो उनका जीवन अभी भी सुखी और सुरक्षित हो सकता था। लेकिन अब यह सब बीते हुए समय की बात हो गई थी।(Do Sir Vala Bharund END)
Do Sir Vala Bharund कहानी का अंत और शिक्षा
यह कहानी यह दर्शाती है कि आपसी द्वेष और फूट कभी किसी का भला नहीं करती। भारुंड के दोनों सिर, जो एक ही शरीर के हिस्सेदार थे, अगर आपसी समझदारी से काम करते, तो वे अपने जीवन को सुरक्षित रख सकते थे। लेकिन जब द्वेष और अहंकार किसी के मन में घर कर लेते हैं, तो वे सिर्फ विनाश की ओर ले जाते हैं। इस कहानी का अंत हमें यह शिक्षा देता है कि एकता और सहयोग से ही किसी भी समस्या का समाधान संभव है। जब लोग एकजुट होकर काम करते हैं, तब ही वे सफल होते हैं।
Do Sir Vala Bharund नैतिक शिक्षा:
आपसी द्वेष और फूट हमेशा विनाश की ओर ले जाती है। एकता और समझदारी से ही जीवन की समस्याओं का समाधान होता है।”
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