कृष्ण भगवान की कहानी – भाग 1: बाल लीलाएँ और राक्षसों का संहार
Krishna Bhagwan Ki Kahani– बहुत समय पहले की बात है। मथुरा नगरी पर अत्याचारी राजा कंस का शासन था। वह इतना निर्दयी था कि उसने अपनी ही बहन देवकी और उसके पति वासुदेव को जेल में डाल दिया था। एक आकाशवाणी ने कंस को चेतावनी दी थी कि देवकी की आठवीं संतान ही उसका अंत करेगी। डर के कारण, उसने एक-एक कर देवकी की सात संतानों को जन्म लेते ही मार डाला।

हेलो दोस्तो ! आपका इस वेबसाइट में आप सभी का स्वागत है। आज की इस कहानी का नाम है – “कृष्ण भगवान की कहानी”| Krishna Bhagwan Ki Kahani| हिंदी कहानी यह एक Bhakti Sagar है। अगर आपको पढ़ने का शौक है तो इस कहानी को पूरा जरूर पढ़ें।जब देवकी की आठवीं संतान का समय आया, तभी आधी रात को एक चमत्कार हुआ। जेल के पहरेदार सो गए, हथकड़ियाँ अपने आप खुल गईं, और द्वार अपने आप खुल गए। उसी समय भगवान विष्णु का रूप प्रकट हुआ और उन्होंने वासुदेव और देवकी को बताया कि वे स्वयं उनके पुत्र के रूप में जन्म ले रहे हैं। वासुदेव को आदेश मिला कि वे इस बालक को गोकुल ले जाकर नंद और यशोदा को सौंप दें।(Krishna Bhagwan Ki Kahani)
वर्षा की रात थी। घनघोर अंधेरा था, और यमुना नदी उफान पर थी। लेकिन जैसे ही वासुदेव ने बालक को टोकरी में रखकर नदी पार करनी शुरू की, जल शांत हो गया। उनके सिर के ऊपर शेषनाग ने छत्र बना लिया। सुरक्षित रूप से वासुदेव गोकुल पहुँचे और वहाँ यशोदा के नवजात पुत्र को लेकर वापस लौट आए। किसी को कुछ पता नहीं चला। गोकुल में यशोदा ने कृष्ण को अपनी गोद में उठाया और एक माँ की ममता से उन्हें पालने लगीं।(Krishna Bhagwan Ki Kahani)
गोकुल में बालकृष्ण की शरारतें
कृष्ण जैसे-जैसे बड़े होने लगे, उनके बालरूप ने पूरे गोकुल को मोह लिया। उनके नीले रंग का शरीर, आँखों में चमक, और मुस्कुराता चेहरा सबका मन मोह लेता था। वे नटखट भी थे और अत्यंत प्रिय भी। उनकी सबसे प्रसिद्ध शरारत थी — मक्खन चोरी। वे अपने मित्रों के साथ गोपियों के घरों में घुस जाते, मटकों को फोड़ते और ताजे मक्खन का आनंद लेते। गोपियाँ जब शिकायत लेकर यशोदा मैया के पास जातीं, तो यशोदा हँसते हुए कहतीं, “”अरे, मेरे लला तो दूध पीकर सो रहे थे!””
कृष्ण की ये शरारतें केवल मनोरंजन नहीं थीं, बल्कि उनमें ईश्वर की लीलाएँ छिपी थीं। उनके बालरूप में ही गोकुलवासियों को ईश्वरीय अनुभूति होती थी।
पूतना वध
कंस जानता था कि उसकी मृत्यु देवकी के आठवें पुत्र से ही होगी। इसलिए उसने अनेक राक्षसों को भेजा, ताकि वह बालक मारा जा सके। उनमें से पहली थी — पूतना। वह एक राक्षसी थी जो बच्चों को विष देकर मार देती थी। उसने सुंदर स्त्री का रूप धारण किया और गोकुल पहुँची। यशोदा के घर जाकर उसने कृष्ण को गोद में लिया और उन्हें अपना विषभरा स्तनपान कराने लगी।
लेकिन जैसे ही कृष्ण ने स्तनपान शुरू किया, उन्होंने केवल दूध ही नहीं, उसकी प्राणशक्ति भी खींच ली। पूतना चिल्लाती हुई अपने असली विशाल राक्षसी रूप में आ गई और धरती पर गिरकर मर गई। यह देखकर सभी गाँववासी चकित रह गए, पर किसी को समझ नहीं आया कि यह लला कौन है जिसने एक खतरनाक राक्षसी को मार डाला।(Krishna Bhagwan Ki Kahani)
शकटासुर, त्रिणावर्त और अघासुर वध
एक दिन जब कृष्ण पालने में झूले पर थे, यशोदा ने उन्हें बाहर छाँव में सुला दिया। तभी शकटासुर नामक एक राक्षस ने रथ के पहिए में प्रवेश कर लिया। वह कृष्ण को कुचलना चाहता था। पर बालकृष्ण ने अपने छोटे-छोटे पैरों से रथ को इस तरह झटका दिया कि रथ पलट गया और राक्षस वहीं मारा गया।
फिर आया त्रिणावर्त — एक तूफान बनकर आया राक्षस। वह कृष्ण को उठाकर आकाश में उड़ गया। लेकिन कृष्ण ने उसकी गर्दन पकड़ ली और वह गिरकर मर गया।
कुछ समय बाद अघासुर नामक राक्षस एक विशाल अजगर का रूप लेकर आया। वह कृष्ण और उनके सखाओं को निगलने के लिए मुँह फैलाए बैठा था। सभी सखा उसके भीतर चले गए। अंत में कृष्ण भी अंदर पहुँचे और वहीं से अजगर का शरीर फाड़कर बाहर निकले। अघासुर वहीं समाप्त हो गया।
कालिया नाग मर्दन
यमुना नदी का जल एक समय विषाक्त हो गया था। वहाँ कालिया नामक नाग अपने परिवार के साथ वास करता था। गाँववाले जल से डरते थे। एक दिन कृष्ण ने यमुना में छलांग लगा दी। कालिया ने उन्हें चारों ओर से घेर लिया। परंतु कृष्ण ने उसके फनों पर नृत्य करना शुरू कर दिया। उसका अहंकार टूट गया। उसने क्षमा माँगी और यमुना से सदा के लिए विदा हो गया। इस घटना के बाद यमुना फिर से निर्मल हो गई और गाँववालों ने राहत की साँस ली।
गोवर्धन लीला
हर वर्ष ब्रजवासी इन्द्रदेव की पूजा करते थे। इन्द्र को घमंड था कि वह वर्षा का देवता है और सभी उसकी कृपा से जीवित हैं। पर कृष्ण ने गाँववालों को समझाया कि वे गोवर्धन पर्वत की पूजा करें, जो उन्हें गो-चारा, जल और छाया देता है।
इन्द्र को यह अपमान सहन नहीं हुआ। उसने काले-काले बादलों से भीषण वर्षा शुरू कर दी। पूरा गोकुल डूबने लगा। तब कृष्ण ने अपनी छोटी उँगली पर गोवर्धन पर्वत को उठा लिया। सभी गाँववासी, गाय-बछड़े, गोप-गोपियाँ उसके नीचे आकर सुरक्षित हो गए। सात दिन तक वर्षा होती रही, पर सब सुरक्षित रहे।
अंत में इन्द्र को अपनी गलती का अहसास हुआ। उसने कृष्ण से क्षमा माँगी और उनके चरणों में शीश झुकाया। उस दिन से कृष्ण को ‘गोवर्धनधारी’ कहा जाने लगा।
Krishna Bhagwan Ki Kahani – भाग 2: मथुरा यात्रा से महाभारत तक
कंस वध
गोकुल और वृंदावन में बाललीलाएँ करते हुए भगवान कृष्ण बड़े हुए। परंतु उन्हें भलीभाँति ज्ञात था कि उनका जन्म किसी विशेष उद्देश्य की पूर्ति के लिए हुआ है — अधर्म के अंत और धर्म की स्थापना के लिए। जैसे-जैसे समय बीतता गया, कंस को यह पता चल गया कि वासुदेव और देवकी का पुत्र जीवित है और गोकुल में बड़ा हो चुका है। उसने कृष्ण और बलराम को मथुरा बुलाने के लिए एक योजना रची।(Krishna Bhagwan Ki Kahani)
कंस ने एक भव्य धनुष यज्ञ और मल्लयुद्ध प्रतियोगिता का आयोजन किया, जिसमें कृष्ण और बलराम को विशेष रूप से आमंत्रित किया गया। नंद बाबा और अन्य गोकुलवासी भी उनके साथ मथुरा पहुँचे। मथुरा में पहली बार कृष्ण ने भगवान शिव को समर्पित धनुष तोड़ा और राक्षसों को पराजित किया।
अंततः वह दिन आया जब रंगभूमि में मल्लयुद्ध हुआ। वहाँ दो बलशाली पहलवान – चाणूर और मुष्टिक – उपस्थित थे। कंस ने इन्हें भेजा कि वे कृष्ण और बलराम को युद्ध में मार डालें। परंतु कृष्ण ने चाणूर का और बलराम ने मुष्टिक का पराक्रम से वध कर दिया।
इसके पश्चात कृष्ण ने रंगभूमि में ही कंस को सिंहासन से खींचकर नीचे गिराया और उसके अत्याचार का अंत किया। मथुरा की प्रजा ने जयघोष किया — “जय श्रीकृष्ण!”। मथुरा फिर से धर्म के मार्ग पर लौट आई।(Krishna Bhagwan Ki Kahani)
द्वारका की स्थापना
हालाँकि कंस का अंत हो चुका था, पर मथुरा की शांति स्थायी नहीं थी। कंस का ससुर जरासंध बार-बार मथुरा पर चढ़ाई करने लगा। उसकी सेना विशाल थी और उसका उद्देश्य था कृष्ण और यादवों का अंत करना।
कृष्ण ने युद्ध से नहीं, बुद्धि से उपाय निकाला। उन्होंने यादवों को मथुरा से समुद्र के तट पर ले जाकर एक नवीन नगरी की स्थापना की — द्वारका। यह नगरी समुद्र के मध्य में थी, सुरक्षित, सुव्यवस्थित और भव्य। द्वारका की स्थापना एक उदाहरण बन गई — जब भी शांति चाहिए, तो केवल युद्ध नहीं, युक्ति भी ज़रूरी है।
द्वारका में यादव कुल का पुनर्वास हुआ और कृष्ण एक कुशल राजनेता, मार्गदर्शक और भगवान के रूप में प्रतिष्ठित हुए।
रुक्मिणी विवाह और अन्य पत्नियाँ
द्वारका में रहते हुए कृष्ण ने रुक्मिणी से विवाह किया। रुक्मिणी विदर्भ की राजकुमारी थीं। वह बचपन से ही कृष्ण को मन-ही-मन अपना पति मान चुकी थीं। परंतु उनके भाई रुक्मी ने उनका विवाह शिशुपाल से तय कर दिया। रुक्मिणी ने कृष्ण को एक पत्र भेजा, जिसमें उन्होंने उनसे सहायता माँगी।
कृष्ण ने बिना देर किए रुक्मिणी का अपहरण किया — लेकिन यह अपहरण प्रेम का प्रतीक था। उन्होंने रुक्मी को हराया और रुक्मिणी को अपनी पत्नी बनाकर द्वारका ले आए। उनके विवाह को प्रेम, निष्ठा और भाग्य का उदाहरण माना जाता है।
कृष्ण की अन्य पत्नियों में सत्या, जाम्बवती, लक्ष्मणा आदि थीं। इन विवाहों के पीछे भी कई लीलाएँ और सामाजिक-सांस्कृतिक संदर्भ जुड़े हैं। हर विवाह कोई न कोई संदेश देता है — चाहे वह मित्रता हो, नीति हो या सम्मान।
महाभारत युद्ध और श्रीमद्भगवद्गीता
समय बीतता गया। कुरुक्षेत्र की भूमि पर अधर्म और धर्म की निर्णायक लड़ाई का समय आ पहुँचा। कौरव और पांडवों के बीच मतभेद गहराते गए। युद्ध अवश्यंभावी था। जब अर्जुन ने देखा कि उसके सामने गुरू द्रोणाचार्य, पितामह भीष्म और अपने ही संबंधी खड़े हैं, तो वह युद्ध करने से हिचक गया।
तभी भगवान श्रीकृष्ण ने उसे गीता का उपदेश दिया। वे स्वयं पांडवों के पक्ष में सारथी बने, लेकिन युद्ध में हथियार नहीं उठाया। गीता के 700 श्लोकों में उन्होंने अर्जुन को बताया —
“कर्मण्येवाधिकारस्ते मा फलेषु कदाचन” — अर्थात् तेरा अधिकार केवल कर्म पर है, फल पर नहीं।
कृष्ण ने उसे सिखाया कि जब धर्म खतरे में हो, तब मोह नहीं, कर्तव्य प्रधान होता है। गीता केवल एक ग्रंथ नहीं, बल्कि जीवन का दर्शन है। उन्होंने अर्जुन को युद्ध के लिए प्रेरित किया, और वही युद्ध इतिहास बन गया।(Krishna Bhagwan Ki Kahani)
महाभारत युद्ध और धर्म की स्थापना
कृष्ण की रणनीति, नीतिकुशलता और मार्गदर्शन से पांडवों को विजय मिली। भीष्म की प्रतिज्ञा, द्रोण की शक्ति, कर्ण की दानशीलता — सब युद्ध की तपन में परखे गए। कृष्ण ने यह दिखा दिया कि सत्य की रक्षा के लिए यदि छल का सहारा भी लेना पड़े, तो वह धर्म का ही रूप होता है, यदि उसका उद्देश्य उच्च हो।
महाभारत युद्ध के पश्चात धर्म की पुनः स्थापना हुई। युधिष्ठिर ने धर्म के अनुसार राज्य चलाया। पर कृष्ण जानते थे कि युद्ध भले ही समाप्त हो गया हो, पर अहंकार और विनाश की अग्नि शेष है।
कृष्ण लीला का समापन
महाभारत के पश्चात कई वर्षों तक द्वारका समृद्ध रही। परंतु जैसे-जैसे समय बीतता गया, यादवों में अहंकार और वैमनस्य बढ़ने लगा। कृष्ण इस स्थिति से चिंतित थे। अंततः, प्रभास क्षेत्र में एक दिन यादवों में विवाद हुआ और एक भयानक मूसल युद्ध छिड़ गया। एक-दूसरे के विरुद्ध यादवों ने ही अस्त्र उठाए और धीरे-धीरे उनका अंत हो गया।
कृष्ण सब देख रहे थे — शांत, स्थिर, जैसे यह सब नियति का खेल हो। उन्होंने जान लिया था कि द्वापर युग का अंत समीप है।
एक दिन वे प्रभास तीर्थ के जंगल में ध्यानमग्न थे। तभी एक शिकारी ने भ्रमवश उन्हें हिरण समझकर तीर मार दिया। तीर उनके चरण में लगा। कृष्ण मुस्कुराए और उस शिकारी को क्षमा कर दिया। यही वह क्षण था जब पृथ्वी से विष्णु के अवतार ने अपनी लीला समाप्त की।
उनके देहत्याग के साथ ही द्वापर युग का समापन हो गया और कलियुग का आरंभ हुआ।(ENDKrishna Bhagwan Ki Kahani)
इस Krishna Bhagwan Ki Kahani सीख (Moral of the Story):
- भगवान श्रीकृष्ण का जीवन केवल चमत्कारों की कथा नहीं है, वह नीति, करुणा, धर्म और विवेक का जीवंत उदाहरण है।
- उन्होंने बताया कि जीवन में केवल भक्ति नहीं, कर्म भी ज़रूरी है।
- मोह, क्रोध, अहंकार — इनसे मुक्ति ही सच्चा धर्म है।
- धर्म की रक्षा के लिए साहस और विवेक दोनों आवश्यक हैं।
- किसी भी परिस्थिति में अपना कर्तव्य न भूलना ही जीवन का उद्देश्य होना चाहिए।
- श्रीमद्भगवद्गीता का ज्ञान आज भी हर व्यक्ति के जीवन में मार्गदर्शन करने वाला प्रकाश है।
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